Kaise Bane Balak Sanskari Aur Swashth By Dr Prem Bhargav

 

कैसे बने बालक संस्कारी और स्वस्थ - प्रेम भार्गव

 

जिज्ञासा मानव-विकास की आदि एव मुलभुत आवश्यकता है। उसकी रक्षा से ही हम समाज को विकसित, सम्पन्न एव उन्नत बना सकते हैं। पर प्राय:देखा जाता है की व्यस्त माता -पिता बच्चो के प्रश्नो से खीज जाते है और उनको सदैव अपने काम में बाधा उपस्थित करनेवाले प्राणी समझते है। उनको उद्दंड और मुर्ख ठहरकर उन्हें चुप करा देते है और उनकी जिज्ञासा प्रवृति को कुचल देते है। ऐसे बालक खुद को उपेक्षित, अनभीष्ट और प्रेमवंचित महसूस करते है। इसका परिणाम बहुत ही भयावह होता है।

 

बालक संसार में सुरक्षा और स्थिरता चाहता है। बालक के भावनात्मक विकास के लिए पिता के अधिकार,माँ के ममत्व और भाई-बहन की उदारता एव सौहार्द की बहुत आवश्यकता है। ऐसा न होने पर उसके मन में भाँति-भाँति की ग्रन्थियां पड जाती है, जो भविषय में उसके सारे व्यवहारों को प्रभावित करती है। कई बार देखा गया है की पिता के बढते वर्चस्व को देखकर माँ में असुरक्षा की भावना घर करने लगती है। अपना वर्चस्व बनाए रखने के लिए वह अपनी ही बात मनवाना चाहती है, पिता के बीचमे बोलने पर रोक देती है,ऐसी स्थिति में बच्चे उद्दंड और बद्तमीज हो जाते है। पिता को अहमियत नहीं देते। इसके विपरीत माँ के डाँटने -मारने के समय यदि पिता बच्चो का पक्ष लेता है तब भी बच्चे बिगड़ जाते है और माँ का सम्मान नहीं करते। वास्तव में होना यह चाहिए की यदि माँ किसी गलत बात पर डाँट रही है, तो पिता को चाहिए की बीच मे न बोले और पिता कुछ कह रहा है, तो माँ उस समय चुप रहे।