यार जुलाहे

उर्दू और हिन्दी की दहलीज़ पर खड़े हुए शायर और गीतकार गुलज़ार का तआरूफ़, ही यही है कि वे अपनी शायरी और नज़्मों को थोड़ा हिचकते हुए हिन्दी में ‘संग्रह-निकालना’ कहते हैं। मसला यह कि उर्दू और हिन्दी के दोआबे में हिन्दुस्तानी अल्फाज़ में पकने वाली उनकी कविता की फ़सल दरअसल हिन्दी में उतना ही ‘संग्रह’ है, जितना कि वह उर्दू में नज्मों की किताब।’ ऐसे में उनकी कविता, जो हिन्दी की ज़मीन से निकल कर दूर आसमान तक उर्दू की पतंग बन कर उड़ती है, उसका एक चुनिन्दा पाठ तैयार करना अपने आप से बेहद दिलचस्प और प्रासंगिक है। इस चयन की उपयोगिता तब और बढ़ जाती है, जब हम इस बात से रू-ब-रु होते हैं कि पिछले लगभग पचास बरसों में फैली हुई इस शायर की रचनात्मकता में दुनिया भर के रंग, तमाशे, जब्बात और अफ़साने मिले हुए हैं। गुलज़ार की शायरी की यही पुख़्ता ज़मीन है, जिसका खाका कुछ पेंटिंग्ज, कुछ पोर्टेट, कुछ लैंडस्केप्स और कुछ स्केचेज़ से अपना चेहरा गढ़ता है।

अनगिनत नज़्मों, कविताओं और ग़ज़लों की समृद्ध दुनिया है गुलज़ार के यहाँ, जो अपना सूफियाना रंग लिये हुए शायर का जीवन-दर्शन व्यक्त करती हैं। इस अभिव्यक्ति में जहाँ एक ओर हमें कवि के अन्तर्गत रंगत लिये हुए लगभग निर्गुण कवियों की बोली-बानी के करीब पहुँचने वाली उनकी आवाज़ या कविता का स्थायी फक्कड़ स्वभाव हमें एकबारगी उदासी में तब्दील होता हुआ नज़र आता है। एक प्रकार का वीतरागी भाव या जीवन के गहनतम स्तर तक पहुँचा हुआ ऐसा अवसादी, मन जो प्रचलित अर्थों में अपना आशय विराग द्वारा व्यक्त करता है। उदासी की यही भावना और उसमें सूक्ष्मतम स्तर तक उतरा हुआ अवसाद-भरा जीवन का निर्मम सत्य, इन नज़्मों की सबसे बड़ी ताक़त बन कर हमारे सामने आता है। इस अर्थ में गुलज़ार की कविता प्रेम में विरह, जीवन में विराग, ‘रिश्तों में बढ़ती हुई दूरी और हमारे समय में अधिकांश चीजों के सम्वेदनहीन होते जाने की पड़ताल की कविता है। ज़ाहिर है, इस तरह की कविता में दुख और उदासी उसी तरह से अपना आश्रय पाते हैं, जिस तरह निर्गुण पदों और सूफ़ियाना कलामों में प्रेम और आत्मीयता के क्षण, पीड़ा का रूप धर कर अपनी परिभाषा गढ़ते हैं।