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Grow outward, Grow inward

अतिथि – शिवानी

आज तक उनके किस पूर्वज मुख्यमंत्री ने अपनी जाति को प्रश्रय नहीं दिया। कौन से मुख्य सचिव ने अपनी बिरादरी को महत्वपूर्ण पद नहीं सौंपे। कभी-कभी माधव बाबू का चित्त खिन्न हो उठता। क्या इसी स्वतंत्रता के स्वप्न उन्होंने देखे थे भ्रष्टाचार और जातिवाद से महमह महकती राजनीति में मुख्यमंत्री माधव बाबू अपने बिगड़ैल पुत्र कार्तिक को साधने के लिए पारम्परिक भारतीय ब्रह्मास्त्र का प्रयोग करते हैं, उसकी गाँठ अपने निहित शिक्षक मित्र श्यामाचरण की बेटी जया से बाँधकर। लेकिन सरल, बुद्धिमती और स्वाभिमानी जया पति और मंत्रिपत्नी तथा उनके नशेड़ी बेटी की समवेत बेहूदगियों से क्षुब्ध आई.ए.एस.परीक्षा की तैयारी के दौरान एक बड़े उद्योगपति के पुत्र शेखर से उनकी भेंट के बाद उसके जीवन में नया मोड़ आने ही वाला था, कि नियति उसके अतीत के पन्ने फरफरा कर फिर उसके आगे खोल देती है।

शहर की कुटिल राजनीति, सम्पन्न राजनैतिक घरानों के दुस्सह पारिवारिक दुष्चक्र और पारम्परिक ग्रामीण समाज की कहीं सरल और कहीं काकदृष्टि युक्त टिप्पणियों के ताने-बाने से बुना यह उपन्यास अन्त तक पाठकों की जिज्ञासा का तार टूटने नहीं देता।



कृष्णकली – शिवानी

ऐसा कभी कभी ही होता है कि कोई कृति पुस्तक का आकार लेने भी न पाये किन्तु अपनी प्रसिद्धि से साहित्य-जगत् को चौंका दे। ‘कृष्णकली’ के साथ ऐसा ही हुआ है। कौन है यह कृष्णकली? सौन्दर्य और कौमार्य की अग्निशिखा से मण्डित एक ऐसा नारी-व्यक्तित्व जो शिवानी की लौह-संकल्पिनी मानस-संतान है, एक अद्भुत चरित्र जो अपनी जन्मजात ग्लानि और अपावनकता की कर्दम में से प्रस्फुटित होकर कमल सा फूलता है, सौरभ-सा महकता है और मादक पराग सा अपने सारे परिवेश को मोहाच्छन्न कर देता है।

नये-नये अनुभवों के कण्टकाकीर्ण पथों से गुजरती और काजल की कोठरियों में रहती-सहती यह विद्रोहिणी समाज की वर्जनाओं का वरण करती है किन्तु फिर भी अपनी सहज संस्कारशीलता को छटक नहीं पाती। कृष्णकली ने न कभी हारना, न झुकना, उससे टूटना भले ही स्वीकारा। कृष्णकली का क्या हुआ, जो हुआ वह क्यों हुआ - इन प्रश्नों के समाधान में अनेकानेक पाठकों की विकलता लेखिका ने अत्यन्त निकट से देखी-जानी है...

प्रख्यात कथाकार शिवानी के उपन्यास ‘कृष्णकली’ को हिन्दी के पाठकों से जो आदर-मान मिला है, वह निःसन्देह दुर्लभ है! प्रस्तुत है, उपन्यास का यह नवीनतम संस्करण



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