कृष्णकली – शिवानी

ऐसा कभी कभी ही होता है कि कोई कृति पुस्तक का आकार लेने भी न पाये किन्तु अपनी प्रसिद्धि से साहित्य-जगत् को चौंका दे। ‘कृष्णकली’ के साथ ऐसा ही हुआ है। कौन है यह कृष्णकली? सौन्दर्य और कौमार्य की अग्निशिखा से मण्डित एक ऐसा नारी-व्यक्तित्व जो शिवानी की लौह-संकल्पिनी मानस-संतान है, एक अद्भुत चरित्र जो अपनी जन्मजात ग्लानि और अपावनकता की कर्दम में से प्रस्फुटित होकर कमल सा फूलता है, सौरभ-सा महकता है और मादक पराग सा अपने सारे परिवेश को मोहाच्छन्न कर देता है।

नये-नये अनुभवों के कण्टकाकीर्ण पथों से गुजरती और काजल की कोठरियों में रहती-सहती यह विद्रोहिणी समाज की वर्जनाओं का वरण करती है किन्तु फिर भी अपनी सहज संस्कारशीलता को छटक नहीं पाती। कृष्णकली ने न कभी हारना, न झुकना, उससे टूटना भले ही स्वीकारा। कृष्णकली का क्या हुआ, जो हुआ वह क्यों हुआ - इन प्रश्नों के समाधान में अनेकानेक पाठकों की विकलता लेखिका ने अत्यन्त निकट से देखी-जानी है...

प्रख्यात कथाकार शिवानी के उपन्यास ‘कृष्णकली’ को हिन्दी के पाठकों से जो आदर-मान मिला है, वह निःसन्देह दुर्लभ है! प्रस्तुत है, उपन्यास का यह नवीनतम संस्करण