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Grow outward, Grow inward

Auraten (Hindi Translation of The Company of Women) By Khushwant Singh

साहित्यिक" दृष्टि से यह उपन्यास चौकाने वाला ही कहा जाएगा । लेकिन है यह बहुत ज्यादा पठनीय-पाठक इसके पुष्ट उतटता ही चला जाएगा । यह एक ऐसे अकेले, भले आदमी की कहानी है जो सैक्स की तलाश में भटक रहा है । इस दृष्टी से उपन्यास बहुत सफल है । आश्चर्य ही होता है कि प्रतिभाशाली लेखकों से भरे इस देश में सेक्स का यथार्थ विवश करने के लिए एक ८५ - वर्षीय लेखक की ही जागे आना पडा । खुशवन्त सिंह ने अनेक धर्मों ईसाई, मुस्लिम, हिन्दू, बोद्ध और सिख-की स्त्रीयों' से नायक मोहनकुमार का सम्बन्थ कराया है-और अन्त में यह उपन्यास एक उदासी छोड़ जाता है।



Bolegi Na Bulbul Ab (Hindi Edition of I Shall Not Hear The Nightingale) by Khushwant Singh

बोलेगी न बुलबुल


बोलेगी न बुलबुल अब खुशवंत सिंह के उपन्यास ‘आई शैल नॉट हियर द नाइटिंगल’ का अनुवाद है। समय है 1942-43 जब भारतीय क्रांतिकारियों का ‘भारत छोड़ो’ आंदोलन अपनी चरम सीमा पर था। अंग्रेज़ों के प्रति वफ़ादार, फर्स्ट क्लास मजिस्ट्रेट सरदार बूटा सिंह अपने परिवार के साथ अमृतसर में रहते हैं और खबर है कि जल्द ही सम्मान-सूची में उनका नाम आने वाला है। लेकिन बूटा सिंह इस बात से बिलकुल बेखबर हैं कि उनका बेटा क्रांतिकारियों के एक गिरोह का नेता बन गया है और अंग्रेज़ों के खिलाफ बगावत करने में लगा है। बूटा सिंह को जब यह बात पता चलती है तो वह अपने बेटे को बेदखल कर देते हैं। भगवान में आस्था रखनेवाली बूटासिंह की पत्नी सभराई अपने वाहे गुरु से इस मुश्किल घड़ी का सामना करने के लिए अरदास करती है। एक तरफ बेटे की ज़िन्दगी जीवन और मृत्यु के बीच झूल रही है तो दूसरी तरफ उसके पति की इज़्ज़त का सवाल है। कैसे होगा इस कठिन घड़ी में बचने का उपाय...

जाने-माने लेखक और पत्रकार खुशवंत सिंह का यह उपन्यास भावनाओं की इस उधेड़बुन को बखूबी दर्शाता है।

1915 में हडाली गांव में खुशवत सिंह का जन्म हुआ, जो अब पाकिस्तान में है। अपनी स्नातक की पढ़ाई पूरी करने के बाद, लंदन जा कर उन्होंने वकालत पढ़ी। कुछ समय तक वे वकील बने रहे, लेकिन वकालत में उनका मन नहीं लगा। लिखने-पढ्ने में उनकी रुचि थी, और जब उन्हें भारत सरकार की पत्रिका ‘योजना’ के संपादक के पद का अवसर प्राप्त हुआ, तो उन्होंने उसे तुरन्त स्वीकार कर लिया। उसके बाद वे नेशनल हेरल्ड और द हिन्दुस्तान टाइम्स के संपादक रहे। जब उन्होंने द इलस्ट्रेटेड वीकली ऑफ इंडिया के संपादन की बागडोर संभाली तो यह भारत की सबसे लोकप्रिय पत्रिका बन गई। इस के बाद खुशवंत सिह एक स्वतंत्र पत्रकार के रूप में लिखते रहे और उनका साप्ताहिक स्तंभ विद मैलिस टूवर्ड्स वन एण्ड ऑल देश के दर्जन से अधिक अखबारों और पत्रिकाओं में छपता है और उनके पाठकोँ को बहुत बेसब्री से इसका इंतज़ार रहता है।

ट्रेन टू पाकिस्तान, औरतें, समुद्र की लहरों में और सनसेट क्लब उनके अन्य प्रसिद्ध उपन्यास है जो हिन्दी में भी प्रकाशित हो चुके हैं।



पाकिस्तान मेल

भारत विभाजन की त्रासदी पर केन्द्रित पाकिस्तान मेल सुप्रसिद्ध अंग्रेजी उपन्यासकार खुशवंत सिंह का अत्यन्त मूल्यवान उपन्यास है। सन् 1956 में अमेरिका के ग्रोव प्रेस अवार्ड से पुरुस्कृत यह उपन्यास मूलतः उस अटूट लेखकीय विश्वास का नतीजा है, जिसके अनुसार अन्ततः मनुष्यता ही अपने बलिदानों में जीवित रहती है।

घटनाक्रम की दृष्टि से देखें तो 1947 का भयावह पंजाब चारों तरफ हजारों-हजार बेघर-बार भटकते लोगों का चीत्कार तन मन पर होने वाले बेहिसाब बलात्कार और सामूहिक हत्याएँ लेकिन मजहबी वहशत का वह तूफान मानो-माजरा नामक एक गाँव को देर तक नहीं छू पाया, और जब छुआ तो भी उसके विनाशकारी परिणाम को इमामबख्श की बेटी के प्रति जग्गा के बलिदानी प्रेम ने उलट दिया।

उपन्यास के कथा क्रम को एक मानवीय उत्स तक लाने में लेखक ने जिस सजगता का परिचय दिया है, उससे न सिर्फ उस विभीषिका के पीछे क्रियाशील राजनैतिक और प्रशासनिक विरूपताओं का उद्घाटन होता है, बल्कि मानव चरित्र से जुड़ी अच्छाई-बुराई की परंपरागत अवधारणाएँ भी खंडित हो जाती हैं। इसके साथ ही उसने धर्म के मानव-विरोधी फलसफे और सामाजिक बदलाव से प्रतिबद्ध छद्म को भी उघाड़ा है।

संक्षेप में कहे तो अँग्रेजी में लिखा गया खुशवंत सिंह का उपन्यास भारत-विभाजन को एक गहरे मानवीय संकट के रूप में चित्रित करता है; और अनुवाद के बावजूद ऊषा महाजन की रचनात्मक क्षमता के कारण मूल-जैसा रसास्वादन भी कराता है।



औरतें

'औरतें' एक ऎसे सहज, सामान्य, उच्च शिक्षित, स्वयं व्यापार करके धनी बने व्यक्ति की कहानी है जो झगड़ालू बीवी से तालाक हो जाने के बाद हर रात कामवासना की अपनी स्वभाविक इच्छा की पूर्ती के लिए एक के बाद एक अनेक स्त्रियों से सम्बन्ध स्थापित करता है। उसका मानना है कि कामेच्छा ही सच्चे प्यार की मूल आवश्यकता है, और इस उद्देश्य से वह समाचारपत्रों में विज्ञापन देकर अपने लिए संगिनियों की तलाश करता है।

85-वर्षीय लेखक खुशवन्त सिहं के अनुसार 'औरतें' उनके दिवास्वप्न हैं, उनकी कल्पनाएं हैं, जिन्हें उन्होंने कलमबद्ध कर दिया है। इस अदभुत रूप से पठनीय उपन्यास में प्यार, कामेच्छा और जीवन के यथार्थ का अभूतपूर्व सम्मिश्र है।



सनसेट क्लब

पचानवे वर्ष की उम्र में खुशवंत सिंह की यह उपन्यास लिखने की कोई मंशा नहीं थी। लेकिन उनके अंदर का लेखक कुछ लिखने को कुलबुला रहा था, और जब उनकी एक मित्र ने उन्हें अपने दिवंगत दोस्तों की यादों को शब्दों में गूंथने की सलाह दी तो उन्हें यह बात जम गई, और पुरानी यादों में कल्पनाओं के रंग भरकर बना, "सनसेट क्लब"। तीन उम्रदराज़ दोस्त हर शाम दिल्ली के लोदी गार्डन सैर के लिए आते हैं। बाग में लगी एक बेंच उनका अड्डा है जहां वे रोज़ कुछ देर गपशप करके अपनी जीवन-संध्या में रंग भरने की कोशिश करते हैं।

खुशवंत सिंह एक प्रख्यात पत्रकार, स्तंभकार और उपन्यासकार हैं। पद्मभूषण और पद्मविभूषण से सम्मानित उनका कहानी कहने का अंदाज़ पाठकों में खासा लोकप्रिय है।



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