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ये रिश्ते क्या हैं

'ये रिश्ते क्या हैं' पुस्तक जे. कृष्णमूर्ति द्वारा विभिन्न स्थानों पर दी गयी वार्ताऑ का एवं उनके द्वारा रचित लेखों का प्रासंगिक संकलन है।

हमारा हर उस शख्स से, हर उस शै से क्या रिश्ता है जो हमारे जीवन में है? क्या हमारे रिश्तों में ये द्वंद्व कभी ख़त्म न होंगे? तमाम तरह की स्मृतियों व अपेक्षाओं पर आधारित ये संबंध कितने आधे-अधूरे से हैं, और वर्तमान की जीवंतता से प्राय: अपरिचित, छवियों व पूर्वाग्रहों में कैद इन्हीं रिश्तों में हम सुकून तलाशते हैं। आखिर सही रिश्ता, सम्यक् संबंध है क्या?

कृष्णमूर्ति कहते हैं, 'जब आप खुद को ही नहीं जानते, तो प्रेम व संबंध को कैसे जान पाएंगे'?

'हम रुढ़ियों के दास हैं। भले ही हम खुद को आधुनिक समझ बैठें, मान लें कि बहुत स्वतंत्र हो गये हैं, परंतु गहरे में देखें तो हैं रूढ़िवादी ही। इसमें कोई संशय नहीं है क्योंकि छवि-रचना के खेल को आपने स्वीकार किया है और परस्पर संबंधों को इन्ही के आधार पर स्थापित करते हैं। यह बात उतनी ही पुरातन है जितनी कि ये पहाड़ियां। यह हमारी एक रीती बन गई है। हम इसे अपनाते हैं, इसी में जीते हैं, और इसी से एक दूसरे को यातनाएं देते हैं। तो क्या रीती को रोका जा सकता है?'



शिक्षा क्या है?

शिक्षा क्या है' में जीवन से संबंधित युवा मन के पूछे-अनपूछे प्रशन हैं और जे॰ कृष्णामूर्ति की दूरदर्शी दृष्टि इन प्रशनों को मानो भीतर से आलोकित कर देती है पूरा समाधान कर देती है। ये प्रशन शिक्षा के बारे में हैं, मन के बारे में हैं, जीवन के बारे में हैं, विविध हैं, किन्तु सब एक दूसरे से जुड़े हैं।

गंगा बस उती नहीं है, जो ऊपर-ऊपर हमें नज़र आती है। गंगा तो पूरी की पूरी नदी है, शुरू से आखिर तक, जहां से इसका उदगम होता है, उस जगह से वहां तक, जहां तक यह सागर से एक हो जाती है। सिर्फ सतह पर जो पानी दीख रहा है, वही गंगा है, यह सोचना तो नासमझी होगी। ठीक इसी तरह से हमारे होने में भी कई चीज़ें शामिल हैं, और हमारी ईजादें, सूझें, हमारे अंदाजें, व्शवास, पूजा-पाठ, मंत्र-ये सब तो सतह पर ही हैं। इनकी हमें जांच-परख करनी होगी, और तब इनसे मुक्त हो जाना होगा-इन सबसे, सिर्फ उन एक या दो विचारों, एक या दो विधि-विधानों से ही हीं, जिन्हें हम पसंद नहीं करते।"



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