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Grow outward, Grow inward

Lekin (Manzarnama) by Gulzar

साहित्य में ‘मंजरनामा’ एक मुकम्मिल फार्म है ! यह एक ऐसी विधा है जिसे पाठक बिना किसी रूकावट के रचना का मूल आस्वाद लेते हुए पढ़ सकें ! लेकिन मंजरनामा का अंदाजे-बयाँ अमूमन मूल रचना से अलग हो जाता है या यूं कहें कि वह मूल रचना का इंटरप्रेटेशन हो जाता है ! मंजरनामा पेश करने का एक उद्देश्य तो यह है कि पाठक इस फार्म से रू-ब-रू हो सकें और दूसरा यह कि टी.वी. और सिनेमा में दिलचस्पी रखनेवाले लोग यह देख-जान सकें कि किसी कृति को किस तरह मंजरनामे की शक्ल दी जाती है ! टी.वी. की आमद से मंजरनामों की जरुरत में बहुत इजाफा हो गया है ! ‘लेकिन’... ठोस यकीन, पार्थिव सबूतों और तर्क के आधुनिक आत्मविश्वास पर प्रश्नचिन्ह की तरह खड़ा एक ‘लेकिन’, जिसे गुलजार ने इतनी खूबसूरती से तराशा है कि वैसी किसी बहस में पड़ने की इच्छा ही शेष नहीं रह जाती जो आत्मा और भूत-प्रेत को लेकर अक्सर होती रहती है !

इस फिल्म और इसकी कथा की लोमहर्षक कलात्मकता हमें देर तक वापस अपनी वास्तविक और बदरंग दुनिया में नहीं आने देती जिसे अपने उददंड तर्कों से हम और बदरंग कर दिया करते हैं ! यह पुस्तक इसी फिल्म का मंजरनामा है...पठनीय भी दर्शनीय भी!



Namkeen (Manzarnama) by Gulzar

साहित्य में मंज़रनामा एक मुकम्मिल फॉर्म है। यह एक ऐसी विधा है जिसे पाठक बिना किसी रुकावट के रचना का मूल आस्वाद लेते हुए पढ़ सकें। लेकिन मंज़रनामा का अन्दाज़े-बयाँ अमूमन मूल रचना से अलग हो जाता है या यूँ कहें कि वह मूल रचना का इन्टरप्रेटेशन हो जाता है। मंज़रनामा पेश करने का एक उद्देश्य तो यह है कि पाठक इस फॉर्म से रू-ब-रू हो सकें और दूसरा यह कि टी.वी. और सिनेमा में दिलचस्पी रखनेवाले लोग यह देख-जान सकें कि किसी कृति को किस तरह मंज़रनामे की शक्ल दी जाती है।

टी.वी. की आमद से मंज़रनामों की ज़रूरत में बहुत इज़ाफा हो गया है। समरेश बसु की कहानी पर आधारित गुलज़ार की फिल्म ‘नमकीन’ ज़िन्दगी के बीहड़ में रास्ते टटोलती जिजीविषा के बारे में है। अपने और अपनों के जीने के लिए सम्भावनाएँ बनाने की ज़द्दोजहद के साथ-साथ सामाजिक हिंसा के बीच अकेले पड़ते और मरते जाने की कथा। आज हम अपनी नई निगाह से देखें तो यह औरत की बेबसी और मर्द पर उसकी परम्परागत निर्भरता का कारुणिक आख्यान भी है।



Chhaiya Chhaiya (Geet Sangrah) Bu Gulzar

 

छैयाँ छैयाँ - गुलज़ार

 

रोजगार के सौदों में जब भाव-ताव करता हु गानों की कीमत मागता हु-सब नज्मे आँख चुराती है और करवट लेकर शे'र मिरे मुह ढाँप लिया करते है सब वो शर्मिदा होते है मुजसे में उनसे लजाता हु। बिकनेवाली चीज नहीं पर सोना भी तुलना है तोले-माशो में और हीरे भी कैरेट से तोले जाते है। मै तो उन लम्हों की कीमत माँग रहा था जो में अपनी उम्र उधेड़ के, साँसे तोड़ के देता हु नज्मे क्यों नाराज है ?



Shaharyar Suno by Gulzar

शहरयार सुनो – गुलजार

खुरदरी सख्त बंजर ज़मीनो मे क्या बोइये औऱ क्या काटिये।
आँख की ओस के चन्द कतरो से क्या इन जमीनो को सैराब कर पाओगे,
मै नक्का्द नही ना ही माहिरे फन या जुबान और ग्रामर का माहिर
मै महज एक शहरयार का मद्दाह औऱ उनकी शायरी को महसूस करने वाला शायर हुँ।

शहरयार उमूमन गजल ही सुनते है। किसी महफिल मे हो या मुशायरे मे मगर मुझे उनका लहजा हमेशा नज्म़ का लगता है बात सिर्फ उतनी नही होती, जितनी वो एक शेर मे बन्द कर देते है। थोडी देर वही रुको तो हर शेर के पीछे एक नज्म़ खुलने लगती है। तुम्हारे शहर मे कुछ भी हुआ नही है क्या कि तुमने चीखो को सचमुच सुना नही है? क्या इस शेर के पीछे की नज्म़ खोलो तो एक और शेर सुनाई देता है तमाम खल्के खुदा उस जगह रुकी क्यो है यहाँ रात का नही क्या रुकिये फिर चलिये लहूलुहान सभी कर रहे है। सूरज को किसी को खौफ यहाँ रात का नही क्या तमाम शेर फिर से पढ जाइये और बताइये ये नज्म नही है क्या?

शहरयार अपनी गजलो के लिये जाने जाते है। मेरा ख्याल है शायद इसलिये कि उनकी गजल का शेर सिर्फ एक उध्दरण बन कर रुक नही जाता चलता रहता है एक तसलसुल है बयान मे इखत्सार और लहजे की नर्मी उनका खास अन्दाज है सारा कलाम पढ जाओ कही गुस्से की ऊँची आवाज सुनाई नही देती।

जख्म है दर्द है लेकिन चीखते नही,
सन्नाटो से भरी बोतले बेवने वाले,
मेरी खिडकी के नीचे फिर खडे हुए है
और आवाजे लगा रहे है
बिस्तर की शिकनो से निकलूँ नीचे जाऊँ
उनसे पूछूँ मेरी रुसवाई से क्या मिलता है?

पूरी नज्म एक जुमले की तरह बहती है और इसका दूसरा जुमला है मेरे पास कोई भी कहने वाली बात नही है सुनने की तकत भी कब का गँवा चुका हूँ। नज्म हो या गजल हो गुफ्तगू का ये अन्दाज सरासर उनका अपना है बन्दिशे इतनो आसान है कि कोशिश करो तो लिखना मुश्किल है बात कहने मे कोई प्रयास नजर नही आता लगता सोच रहे है तुझसे मिलने की तुझको पाने की कोई तदबीर सूझी ही नही एक मंजिल पे रुक गयी है हयात ये जर्मी जैने घूमती ही नही अजीब चीज है ये वक्त जिसको कहते है कि आने पाता नही और बीत जाता है होठो से नही लिखी चुपके से इधर आ जाओ हुवस सिवा कोई नही एतराफन एक एक लम्बी साँस की नज्मे है। इखत्सार खुसूसियत है पाँच सात नौ मिसरो मे मज्म पूरी हो जाती है। बात सिर्फ इतनी ही कहते है जितनी तास्सुर दे जाये बात को अफसाना नही बना देते शुरू गे लम्बी नज्मे मिलती है जैसे उनका कद ऊचा होता गया नज्मे छोटी होती गयी।

सारा काम एक बार फिर दोहराया तो एक औऱ बात का एहसास हुआ कोई शहर नजर नही आता और ना ही देहात नजर आता है। देहात है मगर कही दाग धब्बे की तरह मगर छोटे शहर या पुराने शहरो की तहजीब महकती है बयान मे भी मौजूआत मे भी मिडल क्लाम के दर्द धडकते है जिन्हे सहलाने मे उतना ही मजा आता है जितना भरते हुए जख्मो पर हाथ फेरने का मजा आता है रात दिन सूरज प्यास पानी एहसास हर बार उनकी शक्ले बदल देता है रात कभी सहरा हो जाती है कभी दरिया। और फिर दिन कभी दरिया।



यार जुलाहे

उर्दू और हिन्दी की दहलीज़ पर खड़े हुए शायर और गीतकार गुलज़ार का तआरूफ़, ही यही है कि वे अपनी शायरी और नज़्मों को थोड़ा हिचकते हुए हिन्दी में ‘संग्रह-निकालना’ कहते हैं। मसला यह कि उर्दू और हिन्दी के दोआबे में हिन्दुस्तानी अल्फाज़ में पकने वाली उनकी कविता की फ़सल दरअसल हिन्दी में उतना ही ‘संग्रह’ है, जितना कि वह उर्दू में नज्मों की किताब।’ ऐसे में उनकी कविता, जो हिन्दी की ज़मीन से निकल कर दूर आसमान तक उर्दू की पतंग बन कर उड़ती है, उसका एक चुनिन्दा पाठ तैयार करना अपने आप से बेहद दिलचस्प और प्रासंगिक है। इस चयन की उपयोगिता तब और बढ़ जाती है, जब हम इस बात से रू-ब-रु होते हैं कि पिछले लगभग पचास बरसों में फैली हुई इस शायर की रचनात्मकता में दुनिया भर के रंग, तमाशे, जब्बात और अफ़साने मिले हुए हैं। गुलज़ार की शायरी की यही पुख़्ता ज़मीन है, जिसका खाका कुछ पेंटिंग्ज, कुछ पोर्टेट, कुछ लैंडस्केप्स और कुछ स्केचेज़ से अपना चेहरा गढ़ता है।

अनगिनत नज़्मों, कविताओं और ग़ज़लों की समृद्ध दुनिया है गुलज़ार के यहाँ, जो अपना सूफियाना रंग लिये हुए शायर का जीवन-दर्शन व्यक्त करती हैं। इस अभिव्यक्ति में जहाँ एक ओर हमें कवि के अन्तर्गत रंगत लिये हुए लगभग निर्गुण कवियों की बोली-बानी के करीब पहुँचने वाली उनकी आवाज़ या कविता का स्थायी फक्कड़ स्वभाव हमें एकबारगी उदासी में तब्दील होता हुआ नज़र आता है। एक प्रकार का वीतरागी भाव या जीवन के गहनतम स्तर तक पहुँचा हुआ ऐसा अवसादी, मन जो प्रचलित अर्थों में अपना आशय विराग द्वारा व्यक्त करता है। उदासी की यही भावना और उसमें सूक्ष्मतम स्तर तक उतरा हुआ अवसाद-भरा जीवन का निर्मम सत्य, इन नज़्मों की सबसे बड़ी ताक़त बन कर हमारे सामने आता है। इस अर्थ में गुलज़ार की कविता प्रेम में विरह, जीवन में विराग, ‘रिश्तों में बढ़ती हुई दूरी और हमारे समय में अधिकांश चीजों के सम्वेदनहीन होते जाने की पड़ताल की कविता है। ज़ाहिर है, इस तरह की कविता में दुख और उदासी उसी तरह से अपना आश्रय पाते हैं, जिस तरह निर्गुण पदों और सूफ़ियाना कलामों में प्रेम और आत्मीयता के क्षण, पीड़ा का रूप धर कर अपनी परिभाषा गढ़ते हैं।



मीना कुमारी की शायरी

दिल में फिर दर्द उठा
फिर कोई भूली हुई याद
छेड़ती आई पुरानी बात
दिल को डंसने लगी गुज़री हुई जालीम रात
दिल में फिर दर्द उठा
फिर कोई भूली हुई याद बन के नश्तर
रंगे अहसास में उतरी ऐसे
मौत ने ले के मेरा नाम पुकारा जैसे

फ़िल्म जगत में मीनाकुमारी ने एक सफल अभिनेत्री के रूप में कई दशकों तक अपार लोकप्रियता प्राप्त की, लेकिन वह केवल उच्चकोटि की अभिनेत्री ही नहीं एक अच्छी शायर भी थीं। अपने दर्द, ख़्वाबों की तस्वीरों और ग़म के रिश्तों को उन्होंने जो जज़्बाती शक्ल अपनी शायरी में दी, वह बहुत कम लोगों को मालूम है।

उनकी वसीयत के मुताबिक प्रसिद्ध फ़िल्मकार और लेखक गुलज़ार को मीनाकुमारी की २५ निजी डायरियां प्राप्त हुईं। उन्हीं में लिखी नज़्मों, ग़ज़लों और शे’रों के आधार पर गुलज़ार ने मीनाकुमारी की शायरी का यह एकमात्र



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